A song of struggle often used to rouse passion in oppressed groups during meetings and rallies, chiefly in Central and North India. This poem is penned by Prof. Anoop Vashisht.

Below is a link to a video that shows renowned activist Medha Patkar leading a group in singing this song. Lyrics are pasted below too.

 

इसलिए राह संघर्ष की हम चुनें
जिंदगी आंसुओं से नहायी न हो
शाम सहमी न हो , रात हो न डरी
भोर की आंख फिर डबडबायी न हो ।। इसलिए…

सूर्य पर बादलों का न पहरा रहे
रोशनी रोशनाई में डूबी न हो
यूं न ईमान फुटपाथ पर हो पड़ा
हर समय आत्मा सबकी ऊबी न हो
आसमां पे टंगी हो न खुशहालियां
कैद महलों में सबकी कमाई न हो ॥ इसलिए …

कोई अपनी खुशी के लिए गैर की
रोटियां छीन ले हम नहीं चाहते
छींटकर थोड़ा चारा कोई उम्र की
हर खुशी बीन ले हम नहीं चाहते
हो किसी के लिए मखमली बिस्तरा
और किसी के लिये एक चटाई न हो ॥ इसलिए …

अब तमन्नाएं फिर न करें खुदकुशी
ख़्वाब पर ख़ौफ़ की चौकसी न रहे
श्रम के पांवों में हों न पड़ी बेड़ियां
शक्ति की पीठ अब ज्यादती ना सहे
दम न तोड़े कहीं भूख से बचपना
रोटियों के लिए अब लड़ाई न हो ॥ इसलिए …

बह रहा है लहू बेकसूरों का क्यों
जल रही बस्तियां अब गरीबों की क्यों
धर्म के नाम पर हो रहे कत्ल क्यों
जल रहा देश नफरत की आग में क्यों
फिर कभी खून सस्ता न हो गैर का
धर्म के नाम पर फिर लडाई न हो ॥ इसलिए …

contributed by Makarand

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